Tuesday, 14 July 2015

काशी विश्वनाथ मंदिर के विध्वंश की कथा।

मुगल सम्राट औरंगजेब ने 9 अप्रैल 1669, को बनारस के "काशी विश्वनाथ मंदिर" तोड़ने का आदेश जारी किया था.....जिसका पालन कर अगस्त 1669, को काशी विश्वनाथ मंदिर को तोड़कर ज्ञानवापी मस्जिद का निर्माण किया गया था...उस आदेश की कॉपी आज भी एशियाटिक लाइब्रेरी, कोलकाता में सुरक्षित रखी हुयी है ( उस आदेश की कॉपी साथ दे रही हू स्क्रीन शॉट में खुद देखे )
अपने बाप को कैद करने और प्यास से तड़पाने वाले आतातयी तथा धर्माध मुग़ल शासक औरंगजेब ने हिन्दुओं के श्रध्दा और आस्था के केंद्र बनारस सहित प्रमुख तीर्थ स्थलों के मंदिरों को अपने शासन काल में तोड़ने और हिन्दुओं को मानसिक रूप से पराजित करने के हरसंभव प्रयास किये.....औरंगजेब के गद्‌दी पर आते ही लोभ और बल प्रयोग द्वारा धर्मान्तरण ने भीषण रूप धारण किया था अप्रैल 1669 में चार हिन्दू कानूनगो बरखास्त किये गये...... जिन्हे मुसलमान हो जाने पर वापिस ले लिये गया .... औरंगजेब की घोषित नीति थी 'कानूनगो बशर्ते इस्लाम' अर्थात्‌ मुसलमान बनने पर कानूनगोई...
द्वादश ज्योतिर्लिंगों में प्रमुख काशी विश्वनाथ मंदिर अनादिकाल से काशी में है... यह स्थान शिव और पार्वती का आदि स्थान है इसीलिए आदिलिंग के रूप में अविमुक्तेश्वर को ही प्रथम लिंग माना गया है.. इसका उल्लेख महाभारत और उपनिषद में भी किया गया है।
ईसा पूर्व 11वीं सदी में राजा हरीशचन्द्र ने जिस विश्वनाथ मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया था उसका सम्राट विक्रमादित्य ने जीर्णोद्धार करवाया था। उसे ही 1194 में मुहम्मद गौरी ने लूटने के बाद तुड़वा दिया था। इतिहासकारों के अनुसार इस भव्य मंदिर को सन् 1194 में मुहम्मद गौरी द्वारा तोड़ा गया था। इसे फिर से बनाया गया, लेकिन एक बार फिर इसे सन् 1447 में जौनपुर के सुल्तान महमूद शाह द्वारा तोड़ दिया गया। पुन: सन् 1585 ई. में राजा टोडरमल की सहायता से पं. नारायण भट्ट द्वारा इस स्थान पर फिर से एक भव्य मंदिर का निर्माण किया गया। इस भव्य मंदिर को सन् 1632 में शाहजहां ने आदेश पारित कर इसे तोड़ने के लिए सेना भेज दी। सेना हिन्दुओं के प्रबल प्रतिरोध के कारण विश्वनाथ मंदिर के केंद्रीय मंदिर को तो तोड़ नहीं सकी, लेकिन काशी के 63 अन्य मंदिर तोड़ दिए गए।
डॉ. एएस भट्ट ने अपनी किताब 'दान हारावली' में इसका जिक्र किया है कि टोडरमल ने मंदिर का पुनर्निर्माण 1585 में करवाया था। 18 अप्रैल 1669 को औरंगजेब ने एक फरमान जारी कर काशी विश्वनाथ मंदिर ध्वस्त करने का आदेश दिया। यह फरमान एशियाटिक लाइब्रेरी, कोलकाता में आज भी सुरक्षित है।
उस समय के लेखक साकी मुस्तइद खां द्वारा लिखित 'मासीदे आलमगिरी' में इस ध्वंस का वर्णन है। औरंगजेब के आदेश पर यहां का मंदिर तोड़कर एक ज्ञानवापी मस्जिद बनाई गई... 2 सितंबर 1669 को औरंगजेब को मंदिर तोड़ने का कार्य पूरा होने की सूचना दी गई थी... औरंगजेब ने प्रतिदिन हजारों ब्राह्मणों को मुसलमान बनाने का आदेश भी पारित किया था।
आज उत्तर प्रदेश के 90 प्रतिशत मुसलमानों के पूर्वज हिन्दू है.. सन् 1752 से लेकर सन् 1780 के बीच मराठा सरदार दत्ताजी सिंधिया व मल्हारराव होलकर ने मंदिर मुक्ति के प्रयास किए... 7 अगस्त 1770 ई. में महादजी सिंधिया ने दिल्ली के बादशाह शाह आलम से मंदिर तोड़ने की क्षतिपूर्ति वसूल करने का आदेश जारी करा लिया, परंतु तब तक काशी पर ईस्ट इंडिया कंपनी का राज हो गया था इसलिए मंदिर का नवीनीकरण रुक गया... 1777-80 में इंदौर की महारानी अहिल्याबाई द्वारा इस मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया गया था... अहिल्याबाई होलकर ने इसी परिसर में विश्वनाथ मंदिर बनवाया जिस पर पंजाब के महाराजा रणजीत सिंह ने सोने का छत्र बनवाया,.. ग्वालियर की महारानी बैजाबाई ने ज्ञानवापी का मंडप बनवाया और महाराजा नेपाल ने वहां विशाल नंदी प्रतिमा स्थापित करवाई।
सन् 1809 में काशी के हिन्दुओं ने जबरन बनाई गई मस्जिद पर कब्जा कर लिया था, क्योंकि यह संपूर्ण क्षेत्र ज्ञानवापी मं‍डप का क्षेत्र है जिसे आजकल ज्ञानवापी मस्जिद कहा जाता है.... 30 दिसंबर 1810 को बनारस के तत्कालीन जिला दंडाधिकारी मि. वाटसन ने 'वाइस प्रेसीडेंट इन काउंसिल' को एक पत्र लिखकर ज्ञानवापी परिसर हिन्दुओं को हमेशा के लिए सौंपने को कहा था, लेकिन यह कभी संभव नहीं हो पाया... इतिहास की किताबों में 11 से 15वीं सदी के कालखंड में मंदिरों का जिक्र और उसके विध्वंस की बातें भी सामने आती हैं... मोहम्मद तुगलक (1325) के समकालीन लेखक जिनप्रभ सूरी ने किताब 'विविध कल्प तीर्थ' में लिखा है कि बाबा विश्वनाथ को देव क्षेत्र कहा जाता था। लेखक फ्यूरर ने भी लिखा है कि फिरोजशाह तुगलक के समय कुछ मंदिर मस्जिद में तब्दील हुए थे... 1460 में वाचस्पति ने अपनी पुस्तक 'तीर्थ चिंतामणि' में वर्णन किया है कि अविमुक्तेश्वर और विशेश्वर एक ही लिंग है।
वामपंथी इतिहासकार इसे नही समझ पायेगे।

Friday, 10 July 2015

विहार विधान परिषद के चुनाव परिणाम का अर्थ

आज विहार विधान परिषद के चुनाव का परिणाम आये।कुल 24 सीटों मे से राजग को 14 सीटें मिली।इसमें भाजपा को अकेले 12 सीटें मिली।नीतिश को 5,लालू को3,कांग्रेस को 1 सीट मिली।यह आगामी विहार विधान सभा के चुनाव का रिहर्रसल था।जनता ने लालू नीतिश के गठबन्धन को स्वीकार नहीं किया।नीतिश के विरूद्ध सत्ता विरोधी लहर है।मोदी का विहार में जलवा अभी कायम है।इस चुनाव परिणाम से यह निष्कर्ष निकलता है कि विधानसभा चुनाव में भाजपा को बढत मिलने वाली है।विहार की जनता सत्ता परिवर्तन चाहती है।वहाँ जातिगत गठजोड नहीं चलने वाला है।जदयू नीतिश को आगे कर चुनाव लड रही है।भाजपा बिना किसी मुख्यमंत्री के नाम के भाजपा के नाम पर चुनाव लडेगी।भाजपा दिल्ली की गलती नहीं दुहरायेगी।यह रणनीति सही रणनीति है।चुनाव जीतने के बाद मुख्यमंत्री के नाम की घोषणा करेगी।विधान परिषद के चुनाव से जनता के मूड का पता चलता है।भाजपा कार्यकर्ताओं में उत्साह का माहौल है।लालू -नीतिश के खेमें में निराशा है।लालू की इमेज एक भ्रष्टाचारी की है।लालू के साथ मिलने से नीतिश की इमेज को भारी धक्का लगा है।बडा वोट बैंक महादलित नीतिश से नाराज है।इसका लाभ भाजपा को मिल सकता है।कांग्रेस का विहार में कोई अस्तित्व नहीं है।

Thursday, 9 July 2015

मोदी विकास यात्रा का अर्थ

रूस में शंघाई कॉरपोरेशन ऑर्गनाइजेशन (SCO) की होने वाले बैठक से इतर नरेंद्र मोदी और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के बीच मुलाकात की खबरें अभी से सुर्खियों में हैं. लेकिन बुनियादी स्तर पर यह मुलाकात दोनों देशों के रिश्तों में कितना बदलाव ला पाएगा, इस बारे में शक है. हर बार जब भारत और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री किसी अंतर्राष्ट्रीय बैठक में जाते हैं, तो उम्मीदों की कई पतंगे हवा में तैरने लगती हैं.

मोदी फिलहाल मध्य एशिया के पांच देशों के आठ दिनों के दौरे पर हैं. इन देशों में उज्बेकिस्तान, कजाकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, किर्गिकस्तान और ताजिकिस्तान और फिर रूस शामिल हैं. रूस में मोदी एससीओ और ब्रिक्स (ब्राजील, रूस, भारत, चीन, और दक्षिण अफ्रीका) की बैठकों में हिस्सा लेंगे.

मोदी विकास के नाम पर सत्ता में आए और विदेश नीति में उन्होंने अपनी पहल शुरू भी की. मोदी और उनके सलाहकारों को लगता है कि बेहतर अर्थव्यवस्था भारत को घरेलू और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर आगे ले जाने में कामयाब होगी. मोदी की विदेश नीति मुख्य तौर पर भारत में निवेश बढ़ाने पर  जोर दे रही है.

मोदी ने आम चुनाव में प्रचंड बहुमत हासिल करने के बाद अपने शपथ ग्रहण समारोह में सभी दक्षिण एशियाई देशों के राष्ट्राध्यक्षों को आमंत्रित किया था. मोदी के अनुसार भारत उन सभी देशों से करीबी रिश्ते बनाना चाहता है जो भारत में रूचि लेते हैं. इसलिए भारत पड़ोसी देशों को हर प्रकार की आर्थिक सहायता, व्यापार और भरोसे का माहौल देगा. लेकिन उसके बदले में उसे उम्मीद है अन्य देश भी उसकी सुरक्षा और कूटनीतिक जरूरतों को समझेंगे. इसी के तहत भारत अपने करीबी नेपाल, बांग्लादेश और अफगानिस्तान जैसे देशों को दो बिलियन डॉलर की सहायता दे रहा है.

साउथ ईस्ट और सेंट्रल एशियाई देशों में मोदी की कोशिश आर्थिक मदद, व्यापार और कनेक्टिविटी बढ़ाने की है. इसलिए भारत ने मंगोलिया को भी एक बिलियन डॉलर और वियतनाम को 100 डॉलर मिलियन की सहायता दी है. साथ ही भारत सरकार इन क्षेत्रों में रोड और रेल की परियोजनाओं को बढ़ाने में भी मदद करेगी.

दूसरी ओर, नवाज शरीफ भारत और अफगानिस्तान के संबंध में पाकिस्तान की नीति में बदलाव के वादे के साथ सत्ता में आए. हालांकि वहां की सत्ता में सेना का सीधा दखल दर्शाता है कि पाकिस्तान की विदेश और रक्षा नीति पूरी तरह शरीफ के हाथ में नहीं है. मैंने पहले भी अपनी किताब 'एस्केपिंग इंडिया' में पाकिस्तान की अफगानिस्तान और भारत को लेकर विदेश नीति के बारे में बात की है. पाकिस्तान में कई जिहादी ग्रुप हैं. लेकिन भारत को अब भी वहां बड़ा दुश्मन माना जाता है. साथ ही अफगानिस्तान को लेकर पाकिस्तान की ज्यादातर नीति भारत को ध्यान में रख कर बनाई जाती है.

भारत ने 1990 के बाद से ही अपने पड़ोसियों के साथ आर्थिक संबंध बनाने की कवायद शुरू कर दी. इसमें पाकिस्तान भी शामिल है. वहीं पाकिस्तान का नेतृत्व, खासकर सेना की ओर से भारत के साथ आर्थिक रिश्तों को और गहरा करने की कोशिशों का विरोध किया जाता रहा है. उनका मत है कि सबसे पहले कश्मीर मुद्दे का हल निकाला जाना चाहिए. इसी साल जून में शरीफ के विदेश सलाहकार सरताज अजीज ने कहा है कि पाकिस्तान, 'भारत की शर्तों' पर उससे बात नहीं करेगा. साथ ही वह भारत के साथ किसी ऐसे डॉयलॉग में शामिल नहीं होगा जिसका एजेंडा कश्मीर और जल मुद्दा नहीं है.

पाकिस्तान के कर्ताधर्ता इसे समझने को तैयार नहीं है कि सीमा विवाद और आर्थिक सहयोग दो अलग-अलग चीजें हैं. उदाहरण के तौर पर चीन-ताइवान, चीन-जापान, चीन-दक्षिण कोरिया और भारत-चीन का उदाहरण ले सकते हैं. इन सभी देशों के बीच सीमा विवाद हैं, लेकिन इसका असर उनके बीच के व्यापार पर नहीं पड़ा. दरअसल, आर्थिक तौर पर एक-दूसरे के करीब आने से विवादित मुद्दों पर भी बातचीत का एक अच्छा माहौल तैयार होता है.

पाकिस्तान भले ही भारत के साथ आर्थिक समझौते को नहीं बढ़ाना चाहता लेकिन उनके अन्य पड़ोसी देश, जिसमें अफगानिस्तान भी शामिल है, भारत के साथ रिश्ते को लेकर गंभीर हैं. अर्थनीति कहती है कि पाकिस्तान अगर सभी के साथ मिल कर चलने को तैयार नहीं हुआ तो अलग-थलग पड़ जाएगा. इसी साल अप्रैल में अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ घनी ने भारत का दौरा किया. उन्होंने साफ कहा है कि अगर पाकिस्तान उन्हें भारत के साथ व्यापार के लिए रास्ता मुहैया नहीं कराता, तो वे भी पाकिस्तान को मध्य एशिया के लिए रास्ता नहीं देंगे.

आजादी के बाद से ही हर भारतीय प्रधानमंत्री की नीति पाकिस्तान के साथ रिश्ते सुधारने की रही है. मोदी ने हालांकि अलग राह चुनी है. मोदी के अनुसार वह भी पाकिस्तान के साथ रिश्ते मजबूत करना चाहते हैं. लेकिन तभी जब पाकिस्तान सीमा पार से घुसपैठ को बढ़ावा देने बंद करे और अपने पड़ोसी देशों भारत और अफगानिस्तान के साथ आर्थिक रूप से कदम मिला कर चले.

अगर पाकिस्तान का नेतृत्व यह समझता है कि मोदी के कार्यकाल में भी सब कुछ पहले की तरह चलता रहेगा तो उसे संभल जाना चाहिए. पिछले एक साल में इसकी बानगी भी देखने को मिली है. भारतीय प्रधानमंत्री ने पाकिस्तान के साथ सामान्य रिश्ता बनाए रखा है. दोनों प्रधानमंत्रियों ने साड़ी और आम एक-दूसरे को जरूर भेजे हैं लेकिन दोनों देशों के बीच व्यापक स्तर पर बातचीत का माहौल अब भी शुरू नहीं हो सका है. भारतीय विदेश सचिव एस. जयशंकर ने जब मार्च-2015 में पाकिस्तान का दौरा किया. उन्होंने तब भी साफ किया कि यह दौरा सार्क यात्रा के तहत है. इसे दोनों देशों के बीच बातचीत की शुरुआत नहीं मानी जाए.

इसी प्रकार पिछले एक साल में जब भी पाकिस्तान की ओर से गोलीबारी की घटनाएं हुई हैं, भारत ने उसका मजबूती से जवाब दिया है.

बहरहाल, केवल बैठकों से बात नहीं बनने वाली है. कई स्तरों पर बदलाव की जरूरत है. मोदी ने भारत की विदेश नीति में कुछ बदलाव के साथ इसकी शुरुआत की है. मोदी इस समय आर्थिक स्तर पर भारत को दुनिया के अन्य देशों के साथ खड़ा करने की कोशिश में जुटे हैं. पाकिस्तान अगर जल्द ही समझ लेता है कि वह भी आर्थिक स्तर पर इससे फायदा उठा सकता है तभी दोनों देश आगे बढ़ सकते हैं. नहीं तो, बात हाथ मिलाने, वाघा पर कैंडल जलाने, क्रिकेट डिप्लोमेसी और सीमा पर एक-दूसरे को धमकाने तक ही सीमित रह जाएगी.

ब्यापम घोटाला और विपक्ष की राजनीति

म.प्र.के ब्यापम घोटाले को लेकर आज कल राजनीति गर्म है।विपक्ष लगातार इसे मुद्दा बना रहा।इसके बहाने मोदी को घेरे का प्रयास किया जा रहा।सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई के जांच को हरी झंडी दे दी।फिर भी विपक्ष इसे मानने को तैयार नही है।म.प्र.में कोई किसी कारण मर रहा उसे ब्यपम से जोड दिया जा रहा।शिव राज सिंह चौहान की छवि तोड़ने की कोशिश हो रही।कांग्रेस हर कीमत पर भाजपा की सरकार को भ्रष्ट घोषित करने में लगी हुई है।मोदी को भी ब्यापम का जिम्मेदार ठहराने की कोशिश हो रही है।जबकि उनका कोई मतलब नहीं।मर रहे लोग अपने आप हत्यारा साबित हो रहे शिवराज।मिडिया भी इस खेल को हवा देने में जुटी हुई है।मोदी का मुँह खुलवाने के लिए हर प्रयास है।मोदी देश के लिये संसाधन जुटाने में लगे हुये है।विपक्ष विकास नही सिर्फ भाजपा सरकारों को बदनाम करने में जुटी है।इससे विपक्ष को कोई लाभ नहीं होगा।सीबीआई शीघ्र ही दूध का दूध पानी का पानी कर देगी।

Sunday, 31 May 2015