Sunday, 3 April 2016

जेल के किस्से

काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में छात्र राजनीति की शानदार परम्परा रही है।सभी छात्र नेता जुझारू और संघर्षशीला थे।ईमानदारी में इन छात्र नेताओं का कोई जोड़ न था।सभी कांग्रेस के विरोधी थे।लाल मुनि चौबे जी को छोड़ लगभग सभी ने आगे चल कर कांग्रेस का दामन थामे लिया।समाजवादी छात्र नेताओं ने तो कांग्रेस को अपना घर बना लिया।जनसंघी छात्र नेता अपनी ही पार्टी में बने रहे।लेकिन सभी ने इंदिरा गाँधी द्वारा थोपे गये अपात काल का विरोध किया।सभी मीसा में बन्द हुये।चंचल जी उनकी गिरफ्तारी का रोचक संस्मरण बताया।स्वर्गीय लालमुनि चौबे । केंद्रीय कारागार बनारस में जैसे थे वह रूप ही साधु का था।
जितने छात्रनेता थे आपातकाल में सबकी गिरफ्तारी का अलग अलग रंग था । देबू दा मोहन प्रकाश और राधेश्याम सिंह किसी गोदाम में भूमिगत थे , सौभाग्य से वहाँ फोन भी था । देबू दा ने कहा ज़रा डी यम को हड़काओ तो ।और इसी हड़काने को डी यम लंबा खींचता गया , जब तक की पुलिस गोदाम तक नहीं पहुँच गयी । चौबे जी को गंगा से अद्भुत लगाव था गुप्तचर यह जानते थे । लंगोट कस कर ज्यों चौबे जी गंगा में कूदे पुलिस सामने । कब तक तैरते , लेकिन पुलिस को भी जम कर तैरवा दिए । नतीजतन थाने  तक चौबे जी लंगोट में ही लाये गए । मारकंडे सिंह खाने के दुश्मन रहे । जहां कुछ दिखाई पड़ा वहीं टूट पड़ते थे । कचहरी में पुलिस ने केला खाते समय पकड़ा । नेता जी ने एंटी मार दिया वह वही गिर गया । लेकिन चालाक था पुलिसवाला उसने शोर मचा दिया , पाकिट मार है । जनता ने दौड़ा लिया और पकडे गए । राम बचन पांडे जी सारनाथ से पकड़ाए दही के चक्कर में । दही उनका प्रिय भोज रहा । और यह खादिम ? अति चतुराई में । इम्तहान दे के निकल लेंगे । लेकिन पुलिस वहाँ भी हाजिर ।  जेल के किस्से छात्र नेताओं के अलग शोध का विषय है।जिसे लिखा जाना चाहिए।

Saturday, 2 April 2016

यह लेख सच्चाई है

श्री शंकर शरण का यह लेख अवश्य पढ़ें:
असदुल्ला ओवैसी की हँसी उड़ाना एक भूल है। उनका भारत माता की जय, के विरुद्ध बयान एक पुरानी राजनीतिक परंपरा है। समय-समय पर मुसलमानों को उन के नेता शिक्षा देते रहते हैं। यह उसी की एक कड़ी है। ओवैसी ने एक बहाना भर खोजा। अन्यथा कोई प्रसंग नहीं था। आखिर उन्हें तो किसी ने यह जय बोलने के लिए नहीं कहा था। आर.एस.एस. प्रमुख ने नई पीढ़ी को देशभक्ति से जोड़ने की बात की थी। वैसे भी, मुसलमानों को अलग से देश-भक्ति का पाठ पढ़ाना निरर्थक कवायद है। उनके नेता उन्हें सचेत रूप से इस से दूर करते हैं। जमाते इस्लामी द्वारा वंदे-मातरम के विरुद्ध फतवा पहले से दिया हुआ है। अतः जब तक मुस्लिम अपने मजहबी नेताओं की फतवा संस्कृति से मुक्त नहीं हों, उन्हें मानवीय, विवेकशील बातें कहना लगभग व्यर्थ है।

डॉ. अंबेदकर ने इसे समझा था, तभी कहा था- ‘‘मुस्लिम राजनीति अनिवार्यतः मुल्लाओं की राजनीति है और वह मात्र एक अंतर को ही मान्यता देती है – हिन्दू और मुसलमानों के बीच मौजूद अंतर। जीवन के किसी भी धर्मनिरपेक्ष तत्व का मुस्लिम समुदाय की राजनीति में कोई स्थान नहीं है, और वे मुस्लिम राजनीतिक जमात के केवल एक ही निर्देशक सिद्धांत के आगे नतमस्तक होते हैं, जिसे मजहब कहा जाता है।’’ यह इतना पक्का है कि यदि कोई मुस्लिम भी राष्ट्रीय, मानवीय, विवकशील बातें करे तो तुरंत उस पर फतवा दे दिया जाता है।

यह केवल भारत की बात नहीं। एसिया, यूरोप, अमेरिका तक यही स्थिति है। जहाँ मुस्लिम अल्पसंख्यक हैं, वहाँ भी वे देश के हितों से निर्विकार केवल इस्लामी माँगें बढ़ाने की फिराक में रहते हैं। क्योंकि इस्लाम उन्हें उस देश को ‘लड़ाई की जगह’ (दारुल-हरब) मानना सिखाता है, यानी ऐसी जगह जिस पर इस्लामी कब्जा होना बाकी है। भारत, इंग्लैंड, आदि वैसे ही देश हैं जहाँ मुसलमानों के लिए वतन-परस्ती बनाम दारुल-हरब की दुविधा स्थाई बनी रहती है। इसलिए ओवैसी की नाटकीय बयानबाजी नाटक नहीं है। अपने बयान से उन्होंने पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खींचा, किन्तु उनकी बात गंभीर है। उस में एक बुनियादी सत्य है जिस का उत्तर देना तो दूर, भारत के हिन्दू नेता उसे आँख मिला कर देखना तक नहीं सीख सके हैं। यह स्थिति लगभग सौ सालों से है।

आखिर जिन्ना का द्वि-राष्ट्र सिद्धांत क्या था? खलीफत आंदोलन क्या था? मौलाना आजाद का ‘हिजबुल्ला’ (अल्लाह की पार्टी) या अल्लामा इकबाल के ‘शिकवा’ का क्या संदेश था? हाली के ‘मुसद्दस’ में क्या कशिश थी? सब में मूल बात यही थी कि इस्लाम को हू-ब-हू मानने वाले के लिए न तो भारत माता कोई चीज है, न देश-भक्ति, न हिन्दू-मुस्लिम सहमेल। सो या तो केवल मुसलमान भारत पर शासन करेंगे, या अलग रहेंगे। इस उसूल को इस से कोई फर्क नहीं पड़ता कि भारत के नेता मोहनदास हैं या मोहनराव। न ही इससे कि कितने करोड़ मुसलमान देशभक्त हैं और हिन्दुओं के साथ मिल-जुल कर रहना चाहते हैं।
बात जब उसूल की हो तो सचाई बेबाक है। मसला उसी का सामना करने का है, चाहे वह हिन्दू हों या मुसलमान। उन्हें सोचना है और अपना कर्तव्य तय करना हैः इस्लाम बड़ा या देश-भक्ति? इस सवाल से कतराने का मतलब है खुद को धोखा देना।
इस उसूल को अल्लामा इकबाल ने सटीक व्यक्त किया था – “इन ताजा खुदाओं में सब से बड़ा वतन है। जो पैरहन है उस का वो मजहब का कफन है।” यानी वतन-परस्ती इस्लाम के लिए मौत समान है। इसलिए वतन-परस्ती को गलत बताते हुए इकबाल कहते हैं, “कौम मजहब से है; मजहब जो नहीं, तुम भी नहीं। जज्बे बाहम जो नहीं, महफिले अंजुम भी नहीं” । इसी को उन्होंने ऐसे भी कहा था, “मुस्लिम हैं हम / वतन है, सारा जहाँ हमारा”। यानी, इस्लाम के अनुसार वतन-परस्ती बुतपरस्ती का ही एक रूप है, जिस से उसे घृणा है। अभी ओवैसी ने उसी बात को दुहराया है। जिस का जवाब गाँधीवाद, नेहरूवाद या वर्तमान ‘विकास’-वाद के पास नहीं है।

इसलिए नहीं है क्योंकि सब इस्लामी सिद्धांत की आलोचना से बचना चाहते हैं। सचाई का सामना ही नहीं करना चाहते। केवल करोडों सज्जन, सामान्य मुसलमानों की सहजता के उदाहरण से दिखाना चाहते हैं कि सब ठीक-ठाक है। मानो जिन्ना या ओवैसी, जैसे कुछ राजनीतिबाज गड़बड़ करते हैं। इस तरह, अपने को भुलावा देकर सभी उस सिद्धांत को बिना चुनौती दिए छोड़ देते हैं, जो मुसलमानों को हिन्दुओं से, और देश-भक्ति, सहज बुद्धि, विवेक, आदि से भी दूर रखता है।
तब, समय आने पर जब इस्लामी उसूल मुसलमानों पर अपना प्रभाव दिखाता है, और मुसलमान उसे स्वीकार करते हैं, तो गाँधी-नेहरू जैसा पूरा हिन्दू नेतृत्व खिसियाया, ठगा सा खड़ा रह जाता है। क्योंकि उस ने इस्लामी सिद्धांत की आलोचना करने और मुसलमानों को विवेकशील बनाने का काम हाथ में लिया ही नहीं!

वे खुद भ्रम में थे और हैं, क्योंकि इस्लाम को केवल धर्म, ईश्वर, आदि से जोड़कर देखने में असल चीज नहीं देख पाते। मतलब कि इस्लाम राजनीतिक विचारधारा भी है, बल्कि यही उस का प्राण-तत्व है। खुद अयातुल्ला खुमैनी ने कहा था कि ‘‘पूरा इस्लाम ही राजनीति है।’’ तब राजनीति की, किसी राजनीतिक विचार की आलोचना न करना उसे वाक-ओवर देने के समान है। हिन्दू नेतृत्व पिछले सौ साल से यही गलती करता रहा, और इस से मुसलमानों के साथ साथ हिन्दुओं की भी घोर हानि होती रही है। इस्लाम मूलतः राजनीति ही है, इसे सरलता से परखा जा सकता है। इस्लामी संस्थाएं या नेतृत्व के बयान, प्रस्ताव, माँगें, कार्रवाइयाँ या समाचार प्रायः राजनीतिक प्रभाव के साथ ही आते हैं। दशकों से इस का अपवाद ढूँढना कठिन है। ‘वन्दे मातरम्’ या ‘भारत माता की जय’ कहने का विरोध स्वयं इसी का उदाहरण है। यदि इस्लाम मूलतः राजनीतिक विचारधारा न होता, तो किसी देश के निवासी को अपने देश की जयकार करने से क्यों रोकता? यह प्रश्न गंभीरता से विचार करने का है। ऊपर इकबाल के कथन पर ध्यान दें। इस्लाम अपने अनुयायियों पर संपूर्ण कब्जा चाहता है। वह सर्वाधिकारी, तानाशाही विचारधारा है।

इसीलिए उसे अपनी राजनीतिक भक्ति में भी हिस्सेदारी पसंद नहीं। यदि मुसलमान देशभक्त हों, विशेषकर ऐसे देश में जहाँ वे बहुसंख्यक नहीं, तो वे देश के सामने इस्लामी कानूनों को नीचा मानेंगे। तब शरीयत, दारुल-इस्लाम, जिहाद, निजामे-मुस्तफा, आदि का क्या होगा? इसलिए, केवल भावुकता और व्यंग्य से ओवैसी को हराने की कल्पना करना बचकानी बुद्धि है। ओवैसी मजबूत जमीन पर खड़े हैं। उस जमीन को खिसकाए बिना उन की बात को निर्णायक रूप से हराना नामुमकिन है। इसे मुसलमान बखूबी जानते हैं। अच्छा हो, हिन्दू भी जानें। वरना वे गाँधी और कश्मीरी पंडितों की तरह बार-बार मुँह की खाते रहेंगे।

यह समझना चाहिए कि समस्या ओवैसी या जमाते इस्लामी नहीं हैं। समस्या वह विचारधारा है जो उन्हें निर्देशित करती रही है। इसलिए लड़ना उस विचारधारा से ही होगा। पर हमारे नेता, बुद्धिजीवी ऐसा नहीं करते। उलटे, इस्लामी निर्देशों की ही सकारात्मक व्याख्या या किसी मनपसंद सूफी को ढूँढने लगते हैं। इस कवायद से उलटा फल मिलता है। उलेमा का अपने उसूल पर भरोसा और बढ़ जाता है कि इस्लामी निर्देश देश, समाज, मानवता आदि हर चीज से ऊपर हैं।
ध्यान दें, कि भारत के मुसलमान हर चीज में हिन्दुओं जैसे ही हैं। तब उन्हें कौन सी चीज हिन्दुओं से अलग करती है, और इस अलगाव पर बल देती है? इस प्रश्न का सचाई से सामना करना जरूरी है। तभी समस्या की पहचान होगी और समाधान भी मिलेगा।

Friday, 1 April 2016

मनुस्मृति का संदेश

मनु स्मृति- इन 15 लोगों के साथ कभी वाद-विवाद नहीं करना चाहिए
#पार्थ

कुछ लोग होते हैं जो छोटी-छोटी बातों पर किसी से भी विवाद कर लेते हैं। वह ऐसा जान-बूझकर नहीं करते बल्कि उनका स्वभाव ही ऐसा होता है। मनु स्मृति के अनुसार 15 लोग ऐसे बताए गए हैं, जिनसे कभी विवाद नहीं करना चाहिए। ये 15 लोग इस प्रकार हैं-

श्लोक
ऋत्विक्पुरोहिताचार्यैर्मातुलातिथिसंश्रितैः।
बालवृद्धातुरैर्वैधैर्ज्ञातिसम्बन्धिबांन्धवैः।।
मातापितृभ्यां यामीभिर्भ्रात्रा पुत्रेण भार्यया।
दुहित्रा दासवर्गेण विवादं न समाचरेत्।।

अथार्त- 1. यज्ञ करने वाले, 2. पुरोहित, 3. आचार्य, 4. अतिथियों, 5. माता, 6. पिता, 7. मामा आदि संबंधियों, 8. भाई, 9. बहन, 10. पुत्र, 11. पुत्री, 12. पत्नी, 13. पुत्रवधू, 14. दामाद तथा 15. गृह सेवकों यानी नौकरों से वाद-विवाद नहीं करना चाहिए।

1. यज्ञ करने वाला
यज्ञ करने वाला ब्राह्मण सदैव सम्मान करने योग्य होता है। यदि उससे किसी प्रकार की कोई चूक हो जाए तो भी उसके साथ कभी वाद-विवाद नहीं करना चाहिए। यदि आप ऐसा #पार्थ करेंगे तो इससे आपकी प्रतिष्ठा ही धूमिल होगी। अतः यज्ञ करने वाले वाले ब्राह्मण से वाद-विवाद न करने में ही भलाई है।

2. पुरोहित
यज्ञ, पूजन आदि धार्मिक कार्यों को संपन्न करने के लिए एक योग्य व विद्वान ब्राह्मण को नियुक्त किया जाता है, जिसे पुरोहित कहा जाता है। भूल कर भी कभी पुरोहित से विवाद #पार्थ हीं करना चाहिए। पुरोहित के माध्यम से ही पूजन आदि शुभ कार्य संपन्न होते हैं, जिसका पुण्य यजमान (यज्ञ करवाने वाला) को प्राप्त होता है। पुरोहित से वाद-विवाद करने पर वह आपका काम बिगाड़ सकता है, जिसका दुष्परिणाम यजमान को भुगतना पड़ सकता है। इसलिए पुरोहित से कभी वाद-विवाद नहीं करना चाहिए।

3. आचार्य
प्राचीनकाल में उपनयन संस्कार के बाद बच्चों को शिक्षा के लिए गुरुकुल भेजा जाता था, जहां आचार्य उन्हें पढ़ाते थे। वर्तमान में उन आचार्यों का स्थान स्कूल टीचर्स ने ले लिया है। मनु स्मृति के अनुसार आचार्य यानी स्कूल टीचर्स से भी कभी वाद-विवाद नहीं करना चाहिए।#पार्थ  वह यदि दंड भी दें तो उसे स्वीकार कर लेना चाहिए। आचार्य (टीचर्स) हमेशा अपने छात्रों का भला ही सोचते हैं। इनसे वाद-विवाद करने पर विद्यार्थी का भविष्य भी खतरे में पड़ सकता है।

4. अतिथि
हिंदू धर्म में अतिथि यानी मेहमान को भगवान की संज्ञा दी गई है इसलिए कहा जाता है मेहमान भगवान के समान होता है। उसका आवभगत ठीक तरीके से करनी चाहिए। भूल से भी कभी अतिथि के साथ वाद-विवाद नहीं करना चाहिए। अगर कोई अनजान व्यक्ति #पार्थ भी भूले-भटके हमारे घर आ जाए तो उसे भी मेहमान ही समझना चाहिए और यथासंभव उसका सत्कार करना चाहिए। अतिथि से वाद-विवाद करने पर आपकी सामाजिक प्रतिष्ठा को ठेस लग सकती है।

5. माता
माता ही शिशु की सबसे प्रथम शिक्षक होती है। माता 9 महीने शिशु को अपने गर्भ में धारण करती है और जीवन का प्रथम पाठ पढ़ाती है। यदि वृद्धावस्था या इसके अतिरिक्त भी कभी माता से कोई भूल-चूक हो जाए तो उसे प्यार से समझा देना चाहिए न कि उसके साथ वाद-विवाद करना चाहिए। माता का स्थान गुरु #पार्थ  व भगवान से ही ऊपर माना गया है। इसलिए माता सदैव पूजनीय होती हैं। अतः माता के साथ कभी वाद-विवाद नहीं करना चाहिए।

6. पिता
पिता ही जन्म से लेकर युवावस्था तक हमारा पालन-पोषण करते हैं। इसलिए मनु स्मृति के अनुसार पिता के साथ कभी वाद-विवाद नहीं करना चाहिए। पिता भी माता के ही समान पूज्यनीय होते हैं। हम जब भी किसी मुसीबत में फंसते हैं, तो सबसे पहले पिता को ही याद करते हैं और पिता हमें उस #पार्थ समस्या का समाधान भी सूझाते हैं। वृद्धावस्था में भी पिता अपने अनुभव के आधार पर हमारा मार्गदर्शन करते हैं। इसलिए पिता के साथ वाद-विवाद नहीं करना चाहिए।

7. मामा आदि संबंधी
मामा आदि संबंधी जैसे- काका-काकी, ताऊ-ताईजी, बुआ-फूफाजी, ये सभी वो लोग होते हैं, जो बचपन से ही हम पर स्नेह रखते हैं। बचपन में कभी न कभी ये भी हमारी जरूरतें पूरी करते हैं। इसलिए ये सभी सम्मान करने योग्य हैं। इनसे वाद-विवाद करने पर समाज में हमें सभ्य नहीं समझा जाएगा और हमारी प्रतिष्ठा #पार्थ को भी ठेस लग सकती है। इसलिए भूल कर भी कभी मामा आदि सगे-संबंधियों से वाद-विवाद नहीं करना चाहिए। यदि ऐसी स्थिति बने तो भी समझा-बूझाकर इस मामले को सुलझा लेना चाहिए।

8. भाई
हिंदू धर्म के अनुसार बड़ा भाई पिता के समान तथा छोटा भाई पुत्र के समान होता है। बड़ा भाई सदैव मार्गदर्शक बन कर हमें सही रास्ते पर चलने के प्रेरित करता है और यदि भाई छोटा है तो उसकी गलतियां माफ कर देने में ही बड़प्पन है। विपत्ति आने पर भाई ही भाई की मदद करता है। बड़ा भाई अगर परिवार रूपी वटवृक्ष का तना है तो छोटा भाई उस वृक्ष की #पार्थ  शाखाएं। इसलिए भाई छोटा हो या बड़ा उससे किसी भी प्रकार का वाद-विवाद नहीं करना चाहिए।

9. बहन
भारतीय सभ्यता में बड़ी बहन को माता तथा छोटी बह न को पुत्री माना गया है। बड़ी बहन अपने छोटे भाई-बहनों को माता के समान ही स्नेह करती है। संकट के समय सही रास्ता बताती है। छोटे भाई-बहनों पर जब भी विपत्ति आती है, बड़ी बहन हर कदम पर उनका #पार्थ साथ देती है।
छोटी बहन पुत्री के समान होती है। परिवार में जब भी कोई शुभ प्रसंग आता है, छोटी बहन ही उसे खास बनाती है। छोटी बहन जब घर में होती है तो घर का वातावरण सुखमय हो जाता है। इसलिए मनु स्मृति में कहा गया है कि बहन के साथ कभी वाद-विवाद नहीं करना चाहिए।

10. पुत्र
हिंदू धर्म ग्रंथों में पुत्र को पिता का स्वरूप माना गया है यानी पुत्र ही पिता के रूप में पुनः जन्म लेता है। शास्त्रों के अनुसार #पार्थ  पुत्र ही पिता को पुं नामक नरक से मुक्ति दिलाता है। इसलिए उसे पुत्र कहते हैं-
पुं नाम नरक त्रायेताति इति पुत्रः
पुत्र द्वारा पिंडदान, तर्पण आदि करने पर ही पिता की आत्मा को मोक्ष प्राप्त होता है। पुत्र यदि धर्म के मार्ग पर चलने वाला हो तो वृद्धावस्था में माता-पिता का सहारा बनता है और पूरे परिवार का मार्गदर्शन करता है। इसलिए मनु स्मृति के अनुसार पुत्र से कभी वाद-विवाद नहीं करना चाहिए।

11. पुत्री
भारतीय संस्कृति में पुत्री को लक्ष्मी का रूप माना जाता है। कहते हैं कि भगवान जिस पर प्रसन्न होता है, उसे ही पुत्री प्रदान करता है। संभव है कि पुत्र वृद्धावस्था में माता-पिता का पालन-पोषण न करे, लेकिन पुत्री सदैव अपने माता-पिता का साथ निभाती है। परिवार में होने #पार्थ वाले हर मांगलिक कार्यक्रम की रौनक पुत्रियों से ही होती है। विवाह के बाद भी पुत्री अपने माता-पिता के करीब ही होती है। इसलिए पुत्री से कभी वाद-विवाद नहीं करना चाहिए।

12. पत्नी
हिंदू धर्म में पत्नी को अर्धांगिनी कहा जाता है, जिसका अर्थ है पति के शरीर का आधा अंग। किसी भी शुभ कार्य व पूजन आदि में पत्नी का साथ में होना अनिवार्य माना गया है, उसके बिना पूजा अधूरी ही मानी जाती है। पत्नी ही हर सुख-दुख में पति का साथ निभाती है।#पार्थ  वृद्धावस्था में यदि पुत्र आदि रिश्तेदार साथ न हो तो भी पत्नी कदम-कदम पर साथ चलती है। इसलिए मनु स्मृति के अनुसार पत्नी से भी वाद-विवाद नहीं करना चाहिए।

13. पुत्रवधू
पुत्र की पत्नी को पुत्रवधू कहते हैं। भारतीय संस्कृति के अनुसार पुत्रवधू को भी पुत्री के समान ही समझना चाहिए। पुत्रियों के अभाव में पुत्रवधू से ही घर में रौनक रहती है। कुल की मान-मर्यादा भी पुत्रवधू के ही हाथों में होती है। परिवार के सदस्यों व अतिथियों की सेवा #पार्थ भी पुत्रवधू ही करती है। पुत्रवधू से ही वंश आगे बढ़ता है। इसलिए यदि पुत्रवधू से कभी कोई चूक भी हो जाए तो भी उसके साथ वाद-विवाद नहीं करना चाहिए।

14. गृह सेवक यानी नौकर
मनु स्मृति के अनुसार गृह सेवक यानी नौकर से भी वाद-विवाद नहीं करना चाहिए क्योंकि पुराने सेवक आपकी व आपके परिवार की कई गुप्त बातें जानता है। वाद-विवाद करने पर वह गुप्त बातें सार्वजनिक कर सकता है। जिससे #पार्थ आपके परिवार की प्रतिष्ठा खराब हो सकती है। इसलिए नौकर से भी कभी वाद-विवाद नहीं करना चाहिए।

15. दामाद
पुत्री के पति को दामाद यानी जमाई कहते हैं। धर्म ग्रंथों में दामाद को भी पुत्र के समान माना गया है। पुत्र के न होने पर दामाद ही उससे संबंधित सभी जिम्मेदारी निभाता है तथा ससुर के उत्तर कार्य (पिंडदान, तर्पण, श्राद्ध आदि) करने का अधिकारी भी होता है। दामाद #पार्थ से इसलिए भी विवाद नहीं करना चाहिए क्योंकि इसका असर आपकी पुत्री के दांपत्य जीवन पर भी पढ़ सकता है ।

Thursday, 24 March 2016

वीर सावरकर

राष्ट्र मेरा धर्म...भारत मेरा प्राण :::  वीर सावरकर

वीर सावरकर के प्रथम कीर्तिमान-

1. वीर सावरकर पहले क्रांतिकारी देशभक्त थे जिन्होंने 1901 में ब्रिटेन की रानी विक्टोरिया की मृत्यु पर नासिक में शोक सभा का विरोध किया और कहा कि वो हमारे शत्रु देश की रानी थी, हम शोक क्यूँ करें? क्या किसी भारतीय महापुरुष के निधन पर ब्रिटेन में शोक सभा हुई है.?

2. वीर सावरकर पहले देशभक्त थे जिन्होंने एडवर्ड सप्तम के राज्याभिषेक समारोह का उत्सव मनाने वालों को त्र्यम्बकेश्वर में बड़े बड़े पोस्टर लगाकर कहा था कि गुलामी का उत्सव मत मनाओ...

3. विदेशी वस्त्रों की पहली होली पूना में 7 अक्तूबर 1905 को वीर सावरकर ने जलाई थी...

4. वीर सावरकर पहले ऐसे क्रांतिकारी थे जिन्होंने विदेशी वस्त्रों का दहन किया, तब बाल गंगाधर तिलक ने अपने पत्र केसरी में उनको शिवाजी के समान बताकर उनकी प्रशंसा की थी जबकि इस घटना की दक्षिण अफ्रीका के अपने पत्र 'इन्डियन ओपीनियन' में गाँधी ने निंदा की थी...

5. सावरकर द्वारा विदेशी वस्त्र दहन की इस प्रथम घटना के 16 वर्ष बाद गाँधी उनके मार्ग पर चले और 11 जुलाई 1921 को मुंबई के परेल में विदेशी वस्त्रों का बहिष्कार किया...

6. सावरकर पहले भारतीय थे जिनको 1905 में विदेशी वस्त्र दहन के कारण पुणे के फर्म्युसन कॉलेज से निकाल दिया गया और दस रूपये जुरमाना किया... इसके विरोध में हड़ताल हुई... स्वयं तिलक जी ने 'केसरी' पत्र में सावरकर के पक्ष में सम्पादकीय लिखा...
7. वीर सावरकर ऐसे पहले बैरिस्टर थे जिन्होंने 1909 में ब्रिटेन में ग्रेज-इन परीक्षा पास करने के बाद ब्रिटेन के राजा के प्रति वफादार होने की शपथ नही ली... इस कारण उन्हें बैरिस्टर होने की उपाधि का पत्र कभी नही दिया गया...

8. वीर सावरकर पहले ऐसे लेखक थे जिन्होंने अंग्रेजों द्वारा ग़दर कहे जाने वाले संघर्ष को '1857 का स्वातंत्र्य समर' नामक ग्रन्थ लिखकर सिद्ध कर दिया..
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9. सावरकर पहले ऐसे क्रांतिकारी लेखक थे जिनके लिखे '1857 का स्वातंत्र्य समर' पुस्तक पर ब्रिटिश संसद ने प्रकाशित होने से पहले प्रतिबन्ध लगाया था...

10. '1857 का स्वातंत्र्य समर' विदेशों में छापा गया और भारत में भगत सिंह ने इसे छपवाया था जिसकी एक एक प्रति तीन-तीन सौ रूपये में बिकी थी... भारतीय क्रांतिकारियों के लिए यह पवित्र गीता थी... पुलिस छापों में देशभक्तों के घरों में यही पुस्तक मिलती थी...

11. वीर सावरकर पहले क्रान्तिकारी थे जो समुद्री जहाज में बंदी बनाकर ब्रिटेन से भारत लाते समय आठ जुलाई 1910 को समुद्र में कूद पड़े थे और तैरकर फ्रांस पहुँच गए थे...

12. सावरकर पहले क्रान्तिकारी थे जिनका मुकद्दमा अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय हेग में चला, मगर ब्रिटेन और फ्रांस की मिलीभगत के कारण उनको न्याय नही मिला और बंदी बनाकर भारत लाया गया...

13. वीर सावरकर विश्व के पहले क्रांतिकारी और भारत के पहले राष्ट्रभक्त थे जिन्हें अंग्रेजी सरकार ने दो आजन्म कारावास की सजा सुनाई थी...

14. सावरकर पहले ऐसे देशभक्त थे जो दो जन्म कारावास की सजा सुनते ही हंसकर बोले- "चलो, ईसाई सत्ता ने हिन्दू धर्म के पुनर्जन्म सिद्धांत को मान लिया."

15. वीर सावरकर पहले राजनैतिक बंदी थे जिन्होंने काला पानी की सजा के समय 10 साल से भी अधिक समय तक आजादी के लिए कोल्हू चलाकर 30 पोंड तेल प्रतिदिन निकाला...

16. वीर सावरकर काला पानी में पहले ऐसे कैदी थे जिन्होंने काल कोठरी की दीवारों पर कंकर कोयले से कवितायें लिखी और 6000 पंक्तियाँ याद रखी...

17. वीर सावरकर पहले देशभक्त लेखक थे, जिनकी लिखी हुई पुस्तकों पर आजादी के बाद कई वर्षों तक प्रतिबन्ध लगा रहा...

18. वीर सावरकर पहले विद्वान लेखक थे जिन्होंने हिन्दू को परिभाषित करते हुए लिखा कि-
'आसिन्धु सिन्धुपर्यन्ता यस्य भारत भूमिका.
पितृभू: पुण्यभूश्चैव स वै हिन्दुरितीस्मृतः.'
अर्थात समुद्र से हिमालय तक भारत भूमि जिसकी पितृभू है जिसके पूर्वज यहीं पैदा हुए हैं व यही पुण्य भू है, जिसके तीर्थ भारत भूमि में ही हैं, वही हिन्दू है...

19. वीर सावरकर प्रथम राष्ट्रभक्त थे जिन्हें अंग्रेजी सत्ता ने 30 वर्षों तक जेलों में रखा तथा आजादी के बाद 1948 में नेहरु सरकार ने गाँधी हत्या की आड़ में लाल किले में बंद रखा पर न्यायालय द्वारा आरोप झूठे पाए जाने के बाद ससम्मान रिहा कर दिया... देशी-विदेशी दोनों सरकारों को उनके राष्ट्रवादी विचारों से डर लगता था...

20. वीर सावरकर पहले क्रांतिकारी थे जब उनका 26 फरवरी 1966 को उनका स्वर्गारोहण हुआ तब भारतीय संसद में कुछ सांसदों ने शोक प्रस्ताव रखा तो यह कहकर रोक दिया गया कि वे संसद सदस्य नही थे जबकि चर्चिल की मौत पर शोक मनाया गया था...

21.वीर सावरकर पहले क्रांतिकारी राष्ट्रभक्त स्वातंत्र्य वीर थे जिनके मरणोपरांत 26 फरवरी 2003 को उसी संसद में मूर्ति लगी जिसमे कभी उनके निधन पर शोक प्रस्ताव भी रोका गया था....

22. वीर सावरकर ऐसे पहले राष्ट्रवादी विचारक थे जिनके चित्र को संसद भवन में लगाने से रोकने के लिए कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गाँधी ने राष्ट्रपति को पत्र लिखा लेकिन राष्ट्रपति डॉ. अब्दुल कलाम ने सुझाव पत्र नकार दिया और वीर सावरकर के चित्र अनावरण राष्ट्रपति ने अपने कर-कमलों से किया...

23. वीर सावरकर पहले ऐसे राष्ट्रभक्त हुए जिनके शिलालेख को अंडमान द्वीप की सेल्युलर जेल के कीर्ति स्तम्भ से UPA सरकार के मंत्री मणिशंकर अय्यर ने हटवा दिया था और उसकी जगह गांधी का शिलालेख लगवा दिया...
वीर सावरकर ने दस साल आजादी के लिए काला पानी में कोल्हू चलाया था जबकि गाँधी ने कालापानी की उस जेल में कभी दस मिनट चरखा नही चलाया....

24. महान स्वतंत्रता सेनानी, क्रांतिकारी-देशभक्त, उच्च कोटि के साहित्य के रचनाकार, हिंदी-हिन्दू-हिन्दुस्थान के मंत्रदाता, हिंदुत्व के सूत्रधार वीर विनायक दामोदर सावरकर पहले ऐसे भव्य-दिव्य पुरुष, भारत माता के सच्चे सपूत थे, जिनसे अन्ग्रेजी सत्ता भयभीत थी, आजादी के बाद नेहरु की कांग्रेस सरकार भयभीत थी और अब कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गाँधी के सहयोग से चलने वाली UPA सरकार भयभीत है...

25. वीर सावरकर माँ भारती के पहले सपूत थे जिन्हें जीते जी और मरने के बाद भी आगे बढ़ने से रोका गया... पर आश्चर्य की बात यह है कि इन सभी विरोधियों के घोर अँधेरे को चीरकर आज वीर सावरकर के राष्ट्रवादी विचारों का सूर्य उदय हो रहा है...
मेरा ध्येय है- "राष्ट्र सर्वप्रथम सर्वोपरि"
जय हिंद...जय माँ भारती...
विनायक दामोदर सावरकर