Thursday, 14 April 2016

अम्बेडकर बनाम मनुवाद---सिद्धांत एवं ब्यवहार


अम्बेडकर हिन्दू समाज को जाति विहीन बनाना चाहते थे। नही बना पाये । उन्ही के समाज ने उनकी एक नही सुनी। बेचारे अपने एक मात्र मिशन में हार गये तो अपना मत ही बदल दिया। दलितों को उनके भाग्यपर छोड़कर बौद्ध हो गये। सभी दलित अम्बेडकर की जगह मनु की शरण में ही रहना उचित समझा। आज भी वे जय भीम तो बोलते हैं पर व्यवहार में वे मनु को ही अपनाते हैं। अम्बेडकर को तो उन्होने नारों मे, तस्बीरों में, बुतो में जकड़ रखा है पर मनु उनके जीन्स में समागये हैं। दलित आपस में ही जाति- पाँति मिटाकर एक होना नही चाहते हैं। चमार धोबी के साथ, मेहतर डोम के साथ, डोम दुसाध के साथ सम्बन्ध जोड़ने को तैयार है क्या? बैकवर्डों का भी यही हाल है। यादव बिन्द के साथ, गड़ेर कुरमी, कुम्हार, गोंड आदि के साथ या बैकवर्डों की कोई भी बिरादरी अन्तरजातीय विवाह करने को तैयार है क्या? मनु सहस्सों वर्षों से लोगों के संस्कार बन कर जीवित हैं और जीवित रहेंगे। ऐसे करोड़ों अम्बेडकर उन्हे नही मिटा पायेंगे और हिन्दूधर्म छोड़कर भागते रहेंगे। पर हाँ मनु कर्मणा वर्ण के पक्ष में थे। अस्पृश्यता के विरुद्ध थे। पूरे समाज को विराट पुरुष का शरीर मानते थे और समाज के सुचारुरूप से संचालन के लिये एकात्मता और समता में विषमता की व्यवस्था की थी। ब्राह्मण और शूद्र का निर्धारण का आधार जन्म नही कर्म था,- गुण कर्म विभागशः। एक उदाहरण पर्याप्त होगा,-
   शूद्रो ब्राह्मणतामेति ब्राह्मणश्चैति शूद्रताम्।
   क्षत्रियाज्जतमेवं तु विद्याद्वैश्यात्तथैव च।।
                        मनु स्मृ.१०/६५.
अर्थात्,श्रेष्ठ अश्रेष्ठ कर्मानुसार शूद्र ब्राह्मण और ब्राह्मण शूद्र हो जाता है। यहीं नियम क्षत्रिय और वैश्यों पर भी लागू होता है। पर जिनके हाथ में शास्त्र और लेखनी थी उन्होने अपने पक्ष में बड़ी बेइमानियाँ की। अब इतने सुन्दर नियम के साथ एक श्लोक जोड़ दिया कि ब्राह्मण पतित होते होते सात जन्म में शूद्र होगा और शूद्र उठते उठते सात जन्म में ब्राह्मण होगा।  इस तरह समाज में नगण्य प्रतिशत रखने वाले लोगों की बेइमानियों ने गंगा की तरह पावन और लोक हितकारी मनुस्मृति को प्रदूषित करके रखदिया। इन्हीलोगों ने यदि भगवान् श्री राम के चरित में शम्बूकवध की कथा नही जोड़ी होती तो भगवान श्री राम दलितों के लिये सबसे बड़े मसीहा होते। ये ही समाज में नगण्य प्रतिशत वाले लोग आज भी सुधरने को तैयार नही हैं और हिन्दूसमाज की दुर्दशा के लिये एकमात्र जिम्मेवार हैं।

Sunday, 3 April 2016

कुम्भ में साधुओं के रंग


सिंहस्थ 2016 के लिए साधु-संतों का जमावड़ा
मध्यप्रदेश के उज्जैन में होने लगा है। साधुओं के
अलग-अलग रूप लोगों को लुभा रहे हैं लेकिन एक
संत ऐसे भी हैं जो सबके आकर्षण का केंद्र बने
हुए हैं। गोल्डन बाबा के नाम से पहचाने जाने
वाले ये संत 11 किलो सोने के आभूषण पहनते हैं।
सिंहस्थ में पहली बार ये कैंप लगा रहे हैं।
करोड़ों का बिजनेस छोड़ा, बने संत
कभी दिल्ली में गारमेंट्स के बड़े व्यापारी रहे
गोल्डन बाबा का असली नाम सुधीर कुमार है।
गारमेंट्स के बिजनेस का सालाना टर्न ओवर
करोड़ों का था लेकिन इससे मन ऊब गया, फिर
2012 में इलाहबाद में दीक्षा लेकर सन्यासी हो
गए। सोना पहनने का शौक नया नहीं था,
1970 से सोने के गहने शरीर पर लदे रहते थे।
सन्यास के बाद भी सोने के गहने साथ ही रहे।
सन्यास से पहले लोग इन्हें गोल्डन बाबा के
नाम से पुकारते थे, सन्यास के बाद भी ये नाम
ही चुना अब उनका नाम गोल्डनपुरी बाबा है।
दो गार्ड रहते हैं हरदम साथ
गोल्डन बाबा के साथ सुरक्षा के लिए दो
बॉडीगार्ड हमेशा साथ रहते हैं। एक तिजोरी
साथ चलती है जहां बाबा जाते हैं। रात को
सोते समय गहने उतारे जाते हैं, सुबह नित्यकर्म
और पूजापाठ के बाद फिर पहनते हैं। बाबा जहां
भी जाते हैं गार्ड्स साये की तरह उनके साथ
रहते हैं। उज्जैन सिंहस्थ में जूना अखाड़े से
जुड़कर कैंप लगा रहे हैं जिसमें पूरे महीने भक्ति के
कार्यक्रम और भंडारा होगा।
गले में 21 लॉकेट और मालाएं
गोल्डन बाबा के गले में सोने के 21 लॉकेट और
मालाएं हैं, जो बरबस ही सबका ध्यान खिंचती
हैं। लक्ष्मी, दुर्गा, शिव, विष्णु से लेकर शरीर के
सप्त च्रकों के लॉकेट भी गले में है। दोनों हाथों
में बड़े-बड़े कड़े हैं जो पौराणिक काल के पात्रों
की याद दिलाते हैं।

जेल के किस्से

काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में छात्र राजनीति की शानदार परम्परा रही है।सभी छात्र नेता जुझारू और संघर्षशीला थे।ईमानदारी में इन छात्र नेताओं का कोई जोड़ न था।सभी कांग्रेस के विरोधी थे।लाल मुनि चौबे जी को छोड़ लगभग सभी ने आगे चल कर कांग्रेस का दामन थामे लिया।समाजवादी छात्र नेताओं ने तो कांग्रेस को अपना घर बना लिया।जनसंघी छात्र नेता अपनी ही पार्टी में बने रहे।लेकिन सभी ने इंदिरा गाँधी द्वारा थोपे गये अपात काल का विरोध किया।सभी मीसा में बन्द हुये।चंचल जी उनकी गिरफ्तारी का रोचक संस्मरण बताया।स्वर्गीय लालमुनि चौबे । केंद्रीय कारागार बनारस में जैसे थे वह रूप ही साधु का था।
जितने छात्रनेता थे आपातकाल में सबकी गिरफ्तारी का अलग अलग रंग था । देबू दा मोहन प्रकाश और राधेश्याम सिंह किसी गोदाम में भूमिगत थे , सौभाग्य से वहाँ फोन भी था । देबू दा ने कहा ज़रा डी यम को हड़काओ तो ।और इसी हड़काने को डी यम लंबा खींचता गया , जब तक की पुलिस गोदाम तक नहीं पहुँच गयी । चौबे जी को गंगा से अद्भुत लगाव था गुप्तचर यह जानते थे । लंगोट कस कर ज्यों चौबे जी गंगा में कूदे पुलिस सामने । कब तक तैरते , लेकिन पुलिस को भी जम कर तैरवा दिए । नतीजतन थाने  तक चौबे जी लंगोट में ही लाये गए । मारकंडे सिंह खाने के दुश्मन रहे । जहां कुछ दिखाई पड़ा वहीं टूट पड़ते थे । कचहरी में पुलिस ने केला खाते समय पकड़ा । नेता जी ने एंटी मार दिया वह वही गिर गया । लेकिन चालाक था पुलिसवाला उसने शोर मचा दिया , पाकिट मार है । जनता ने दौड़ा लिया और पकडे गए । राम बचन पांडे जी सारनाथ से पकड़ाए दही के चक्कर में । दही उनका प्रिय भोज रहा । और यह खादिम ? अति चतुराई में । इम्तहान दे के निकल लेंगे । लेकिन पुलिस वहाँ भी हाजिर ।  जेल के किस्से छात्र नेताओं के अलग शोध का विषय है।जिसे लिखा जाना चाहिए।

Saturday, 2 April 2016

यह लेख सच्चाई है

श्री शंकर शरण का यह लेख अवश्य पढ़ें:
असदुल्ला ओवैसी की हँसी उड़ाना एक भूल है। उनका भारत माता की जय, के विरुद्ध बयान एक पुरानी राजनीतिक परंपरा है। समय-समय पर मुसलमानों को उन के नेता शिक्षा देते रहते हैं। यह उसी की एक कड़ी है। ओवैसी ने एक बहाना भर खोजा। अन्यथा कोई प्रसंग नहीं था। आखिर उन्हें तो किसी ने यह जय बोलने के लिए नहीं कहा था। आर.एस.एस. प्रमुख ने नई पीढ़ी को देशभक्ति से जोड़ने की बात की थी। वैसे भी, मुसलमानों को अलग से देश-भक्ति का पाठ पढ़ाना निरर्थक कवायद है। उनके नेता उन्हें सचेत रूप से इस से दूर करते हैं। जमाते इस्लामी द्वारा वंदे-मातरम के विरुद्ध फतवा पहले से दिया हुआ है। अतः जब तक मुस्लिम अपने मजहबी नेताओं की फतवा संस्कृति से मुक्त नहीं हों, उन्हें मानवीय, विवेकशील बातें कहना लगभग व्यर्थ है।

डॉ. अंबेदकर ने इसे समझा था, तभी कहा था- ‘‘मुस्लिम राजनीति अनिवार्यतः मुल्लाओं की राजनीति है और वह मात्र एक अंतर को ही मान्यता देती है – हिन्दू और मुसलमानों के बीच मौजूद अंतर। जीवन के किसी भी धर्मनिरपेक्ष तत्व का मुस्लिम समुदाय की राजनीति में कोई स्थान नहीं है, और वे मुस्लिम राजनीतिक जमात के केवल एक ही निर्देशक सिद्धांत के आगे नतमस्तक होते हैं, जिसे मजहब कहा जाता है।’’ यह इतना पक्का है कि यदि कोई मुस्लिम भी राष्ट्रीय, मानवीय, विवकशील बातें करे तो तुरंत उस पर फतवा दे दिया जाता है।

यह केवल भारत की बात नहीं। एसिया, यूरोप, अमेरिका तक यही स्थिति है। जहाँ मुस्लिम अल्पसंख्यक हैं, वहाँ भी वे देश के हितों से निर्विकार केवल इस्लामी माँगें बढ़ाने की फिराक में रहते हैं। क्योंकि इस्लाम उन्हें उस देश को ‘लड़ाई की जगह’ (दारुल-हरब) मानना सिखाता है, यानी ऐसी जगह जिस पर इस्लामी कब्जा होना बाकी है। भारत, इंग्लैंड, आदि वैसे ही देश हैं जहाँ मुसलमानों के लिए वतन-परस्ती बनाम दारुल-हरब की दुविधा स्थाई बनी रहती है। इसलिए ओवैसी की नाटकीय बयानबाजी नाटक नहीं है। अपने बयान से उन्होंने पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खींचा, किन्तु उनकी बात गंभीर है। उस में एक बुनियादी सत्य है जिस का उत्तर देना तो दूर, भारत के हिन्दू नेता उसे आँख मिला कर देखना तक नहीं सीख सके हैं। यह स्थिति लगभग सौ सालों से है।

आखिर जिन्ना का द्वि-राष्ट्र सिद्धांत क्या था? खलीफत आंदोलन क्या था? मौलाना आजाद का ‘हिजबुल्ला’ (अल्लाह की पार्टी) या अल्लामा इकबाल के ‘शिकवा’ का क्या संदेश था? हाली के ‘मुसद्दस’ में क्या कशिश थी? सब में मूल बात यही थी कि इस्लाम को हू-ब-हू मानने वाले के लिए न तो भारत माता कोई चीज है, न देश-भक्ति, न हिन्दू-मुस्लिम सहमेल। सो या तो केवल मुसलमान भारत पर शासन करेंगे, या अलग रहेंगे। इस उसूल को इस से कोई फर्क नहीं पड़ता कि भारत के नेता मोहनदास हैं या मोहनराव। न ही इससे कि कितने करोड़ मुसलमान देशभक्त हैं और हिन्दुओं के साथ मिल-जुल कर रहना चाहते हैं।
बात जब उसूल की हो तो सचाई बेबाक है। मसला उसी का सामना करने का है, चाहे वह हिन्दू हों या मुसलमान। उन्हें सोचना है और अपना कर्तव्य तय करना हैः इस्लाम बड़ा या देश-भक्ति? इस सवाल से कतराने का मतलब है खुद को धोखा देना।
इस उसूल को अल्लामा इकबाल ने सटीक व्यक्त किया था – “इन ताजा खुदाओं में सब से बड़ा वतन है। जो पैरहन है उस का वो मजहब का कफन है।” यानी वतन-परस्ती इस्लाम के लिए मौत समान है। इसलिए वतन-परस्ती को गलत बताते हुए इकबाल कहते हैं, “कौम मजहब से है; मजहब जो नहीं, तुम भी नहीं। जज्बे बाहम जो नहीं, महफिले अंजुम भी नहीं” । इसी को उन्होंने ऐसे भी कहा था, “मुस्लिम हैं हम / वतन है, सारा जहाँ हमारा”। यानी, इस्लाम के अनुसार वतन-परस्ती बुतपरस्ती का ही एक रूप है, जिस से उसे घृणा है। अभी ओवैसी ने उसी बात को दुहराया है। जिस का जवाब गाँधीवाद, नेहरूवाद या वर्तमान ‘विकास’-वाद के पास नहीं है।

इसलिए नहीं है क्योंकि सब इस्लामी सिद्धांत की आलोचना से बचना चाहते हैं। सचाई का सामना ही नहीं करना चाहते। केवल करोडों सज्जन, सामान्य मुसलमानों की सहजता के उदाहरण से दिखाना चाहते हैं कि सब ठीक-ठाक है। मानो जिन्ना या ओवैसी, जैसे कुछ राजनीतिबाज गड़बड़ करते हैं। इस तरह, अपने को भुलावा देकर सभी उस सिद्धांत को बिना चुनौती दिए छोड़ देते हैं, जो मुसलमानों को हिन्दुओं से, और देश-भक्ति, सहज बुद्धि, विवेक, आदि से भी दूर रखता है।
तब, समय आने पर जब इस्लामी उसूल मुसलमानों पर अपना प्रभाव दिखाता है, और मुसलमान उसे स्वीकार करते हैं, तो गाँधी-नेहरू जैसा पूरा हिन्दू नेतृत्व खिसियाया, ठगा सा खड़ा रह जाता है। क्योंकि उस ने इस्लामी सिद्धांत की आलोचना करने और मुसलमानों को विवेकशील बनाने का काम हाथ में लिया ही नहीं!

वे खुद भ्रम में थे और हैं, क्योंकि इस्लाम को केवल धर्म, ईश्वर, आदि से जोड़कर देखने में असल चीज नहीं देख पाते। मतलब कि इस्लाम राजनीतिक विचारधारा भी है, बल्कि यही उस का प्राण-तत्व है। खुद अयातुल्ला खुमैनी ने कहा था कि ‘‘पूरा इस्लाम ही राजनीति है।’’ तब राजनीति की, किसी राजनीतिक विचार की आलोचना न करना उसे वाक-ओवर देने के समान है। हिन्दू नेतृत्व पिछले सौ साल से यही गलती करता रहा, और इस से मुसलमानों के साथ साथ हिन्दुओं की भी घोर हानि होती रही है। इस्लाम मूलतः राजनीति ही है, इसे सरलता से परखा जा सकता है। इस्लामी संस्थाएं या नेतृत्व के बयान, प्रस्ताव, माँगें, कार्रवाइयाँ या समाचार प्रायः राजनीतिक प्रभाव के साथ ही आते हैं। दशकों से इस का अपवाद ढूँढना कठिन है। ‘वन्दे मातरम्’ या ‘भारत माता की जय’ कहने का विरोध स्वयं इसी का उदाहरण है। यदि इस्लाम मूलतः राजनीतिक विचारधारा न होता, तो किसी देश के निवासी को अपने देश की जयकार करने से क्यों रोकता? यह प्रश्न गंभीरता से विचार करने का है। ऊपर इकबाल के कथन पर ध्यान दें। इस्लाम अपने अनुयायियों पर संपूर्ण कब्जा चाहता है। वह सर्वाधिकारी, तानाशाही विचारधारा है।

इसीलिए उसे अपनी राजनीतिक भक्ति में भी हिस्सेदारी पसंद नहीं। यदि मुसलमान देशभक्त हों, विशेषकर ऐसे देश में जहाँ वे बहुसंख्यक नहीं, तो वे देश के सामने इस्लामी कानूनों को नीचा मानेंगे। तब शरीयत, दारुल-इस्लाम, जिहाद, निजामे-मुस्तफा, आदि का क्या होगा? इसलिए, केवल भावुकता और व्यंग्य से ओवैसी को हराने की कल्पना करना बचकानी बुद्धि है। ओवैसी मजबूत जमीन पर खड़े हैं। उस जमीन को खिसकाए बिना उन की बात को निर्णायक रूप से हराना नामुमकिन है। इसे मुसलमान बखूबी जानते हैं। अच्छा हो, हिन्दू भी जानें। वरना वे गाँधी और कश्मीरी पंडितों की तरह बार-बार मुँह की खाते रहेंगे।

यह समझना चाहिए कि समस्या ओवैसी या जमाते इस्लामी नहीं हैं। समस्या वह विचारधारा है जो उन्हें निर्देशित करती रही है। इसलिए लड़ना उस विचारधारा से ही होगा। पर हमारे नेता, बुद्धिजीवी ऐसा नहीं करते। उलटे, इस्लामी निर्देशों की ही सकारात्मक व्याख्या या किसी मनपसंद सूफी को ढूँढने लगते हैं। इस कवायद से उलटा फल मिलता है। उलेमा का अपने उसूल पर भरोसा और बढ़ जाता है कि इस्लामी निर्देश देश, समाज, मानवता आदि हर चीज से ऊपर हैं।
ध्यान दें, कि भारत के मुसलमान हर चीज में हिन्दुओं जैसे ही हैं। तब उन्हें कौन सी चीज हिन्दुओं से अलग करती है, और इस अलगाव पर बल देती है? इस प्रश्न का सचाई से सामना करना जरूरी है। तभी समस्या की पहचान होगी और समाधान भी मिलेगा।

Friday, 1 April 2016

मनुस्मृति का संदेश

मनु स्मृति- इन 15 लोगों के साथ कभी वाद-विवाद नहीं करना चाहिए
#पार्थ

कुछ लोग होते हैं जो छोटी-छोटी बातों पर किसी से भी विवाद कर लेते हैं। वह ऐसा जान-बूझकर नहीं करते बल्कि उनका स्वभाव ही ऐसा होता है। मनु स्मृति के अनुसार 15 लोग ऐसे बताए गए हैं, जिनसे कभी विवाद नहीं करना चाहिए। ये 15 लोग इस प्रकार हैं-

श्लोक
ऋत्विक्पुरोहिताचार्यैर्मातुलातिथिसंश्रितैः।
बालवृद्धातुरैर्वैधैर्ज्ञातिसम्बन्धिबांन्धवैः।।
मातापितृभ्यां यामीभिर्भ्रात्रा पुत्रेण भार्यया।
दुहित्रा दासवर्गेण विवादं न समाचरेत्।।

अथार्त- 1. यज्ञ करने वाले, 2. पुरोहित, 3. आचार्य, 4. अतिथियों, 5. माता, 6. पिता, 7. मामा आदि संबंधियों, 8. भाई, 9. बहन, 10. पुत्र, 11. पुत्री, 12. पत्नी, 13. पुत्रवधू, 14. दामाद तथा 15. गृह सेवकों यानी नौकरों से वाद-विवाद नहीं करना चाहिए।

1. यज्ञ करने वाला
यज्ञ करने वाला ब्राह्मण सदैव सम्मान करने योग्य होता है। यदि उससे किसी प्रकार की कोई चूक हो जाए तो भी उसके साथ कभी वाद-विवाद नहीं करना चाहिए। यदि आप ऐसा #पार्थ करेंगे तो इससे आपकी प्रतिष्ठा ही धूमिल होगी। अतः यज्ञ करने वाले वाले ब्राह्मण से वाद-विवाद न करने में ही भलाई है।

2. पुरोहित
यज्ञ, पूजन आदि धार्मिक कार्यों को संपन्न करने के लिए एक योग्य व विद्वान ब्राह्मण को नियुक्त किया जाता है, जिसे पुरोहित कहा जाता है। भूल कर भी कभी पुरोहित से विवाद #पार्थ हीं करना चाहिए। पुरोहित के माध्यम से ही पूजन आदि शुभ कार्य संपन्न होते हैं, जिसका पुण्य यजमान (यज्ञ करवाने वाला) को प्राप्त होता है। पुरोहित से वाद-विवाद करने पर वह आपका काम बिगाड़ सकता है, जिसका दुष्परिणाम यजमान को भुगतना पड़ सकता है। इसलिए पुरोहित से कभी वाद-विवाद नहीं करना चाहिए।

3. आचार्य
प्राचीनकाल में उपनयन संस्कार के बाद बच्चों को शिक्षा के लिए गुरुकुल भेजा जाता था, जहां आचार्य उन्हें पढ़ाते थे। वर्तमान में उन आचार्यों का स्थान स्कूल टीचर्स ने ले लिया है। मनु स्मृति के अनुसार आचार्य यानी स्कूल टीचर्स से भी कभी वाद-विवाद नहीं करना चाहिए।#पार्थ  वह यदि दंड भी दें तो उसे स्वीकार कर लेना चाहिए। आचार्य (टीचर्स) हमेशा अपने छात्रों का भला ही सोचते हैं। इनसे वाद-विवाद करने पर विद्यार्थी का भविष्य भी खतरे में पड़ सकता है।

4. अतिथि
हिंदू धर्म में अतिथि यानी मेहमान को भगवान की संज्ञा दी गई है इसलिए कहा जाता है मेहमान भगवान के समान होता है। उसका आवभगत ठीक तरीके से करनी चाहिए। भूल से भी कभी अतिथि के साथ वाद-विवाद नहीं करना चाहिए। अगर कोई अनजान व्यक्ति #पार्थ भी भूले-भटके हमारे घर आ जाए तो उसे भी मेहमान ही समझना चाहिए और यथासंभव उसका सत्कार करना चाहिए। अतिथि से वाद-विवाद करने पर आपकी सामाजिक प्रतिष्ठा को ठेस लग सकती है।

5. माता
माता ही शिशु की सबसे प्रथम शिक्षक होती है। माता 9 महीने शिशु को अपने गर्भ में धारण करती है और जीवन का प्रथम पाठ पढ़ाती है। यदि वृद्धावस्था या इसके अतिरिक्त भी कभी माता से कोई भूल-चूक हो जाए तो उसे प्यार से समझा देना चाहिए न कि उसके साथ वाद-विवाद करना चाहिए। माता का स्थान गुरु #पार्थ  व भगवान से ही ऊपर माना गया है। इसलिए माता सदैव पूजनीय होती हैं। अतः माता के साथ कभी वाद-विवाद नहीं करना चाहिए।

6. पिता
पिता ही जन्म से लेकर युवावस्था तक हमारा पालन-पोषण करते हैं। इसलिए मनु स्मृति के अनुसार पिता के साथ कभी वाद-विवाद नहीं करना चाहिए। पिता भी माता के ही समान पूज्यनीय होते हैं। हम जब भी किसी मुसीबत में फंसते हैं, तो सबसे पहले पिता को ही याद करते हैं और पिता हमें उस #पार्थ समस्या का समाधान भी सूझाते हैं। वृद्धावस्था में भी पिता अपने अनुभव के आधार पर हमारा मार्गदर्शन करते हैं। इसलिए पिता के साथ वाद-विवाद नहीं करना चाहिए।

7. मामा आदि संबंधी
मामा आदि संबंधी जैसे- काका-काकी, ताऊ-ताईजी, बुआ-फूफाजी, ये सभी वो लोग होते हैं, जो बचपन से ही हम पर स्नेह रखते हैं। बचपन में कभी न कभी ये भी हमारी जरूरतें पूरी करते हैं। इसलिए ये सभी सम्मान करने योग्य हैं। इनसे वाद-विवाद करने पर समाज में हमें सभ्य नहीं समझा जाएगा और हमारी प्रतिष्ठा #पार्थ को भी ठेस लग सकती है। इसलिए भूल कर भी कभी मामा आदि सगे-संबंधियों से वाद-विवाद नहीं करना चाहिए। यदि ऐसी स्थिति बने तो भी समझा-बूझाकर इस मामले को सुलझा लेना चाहिए।

8. भाई
हिंदू धर्म के अनुसार बड़ा भाई पिता के समान तथा छोटा भाई पुत्र के समान होता है। बड़ा भाई सदैव मार्गदर्शक बन कर हमें सही रास्ते पर चलने के प्रेरित करता है और यदि भाई छोटा है तो उसकी गलतियां माफ कर देने में ही बड़प्पन है। विपत्ति आने पर भाई ही भाई की मदद करता है। बड़ा भाई अगर परिवार रूपी वटवृक्ष का तना है तो छोटा भाई उस वृक्ष की #पार्थ  शाखाएं। इसलिए भाई छोटा हो या बड़ा उससे किसी भी प्रकार का वाद-विवाद नहीं करना चाहिए।

9. बहन
भारतीय सभ्यता में बड़ी बहन को माता तथा छोटी बह न को पुत्री माना गया है। बड़ी बहन अपने छोटे भाई-बहनों को माता के समान ही स्नेह करती है। संकट के समय सही रास्ता बताती है। छोटे भाई-बहनों पर जब भी विपत्ति आती है, बड़ी बहन हर कदम पर उनका #पार्थ साथ देती है।
छोटी बहन पुत्री के समान होती है। परिवार में जब भी कोई शुभ प्रसंग आता है, छोटी बहन ही उसे खास बनाती है। छोटी बहन जब घर में होती है तो घर का वातावरण सुखमय हो जाता है। इसलिए मनु स्मृति में कहा गया है कि बहन के साथ कभी वाद-विवाद नहीं करना चाहिए।

10. पुत्र
हिंदू धर्म ग्रंथों में पुत्र को पिता का स्वरूप माना गया है यानी पुत्र ही पिता के रूप में पुनः जन्म लेता है। शास्त्रों के अनुसार #पार्थ  पुत्र ही पिता को पुं नामक नरक से मुक्ति दिलाता है। इसलिए उसे पुत्र कहते हैं-
पुं नाम नरक त्रायेताति इति पुत्रः
पुत्र द्वारा पिंडदान, तर्पण आदि करने पर ही पिता की आत्मा को मोक्ष प्राप्त होता है। पुत्र यदि धर्म के मार्ग पर चलने वाला हो तो वृद्धावस्था में माता-पिता का सहारा बनता है और पूरे परिवार का मार्गदर्शन करता है। इसलिए मनु स्मृति के अनुसार पुत्र से कभी वाद-विवाद नहीं करना चाहिए।

11. पुत्री
भारतीय संस्कृति में पुत्री को लक्ष्मी का रूप माना जाता है। कहते हैं कि भगवान जिस पर प्रसन्न होता है, उसे ही पुत्री प्रदान करता है। संभव है कि पुत्र वृद्धावस्था में माता-पिता का पालन-पोषण न करे, लेकिन पुत्री सदैव अपने माता-पिता का साथ निभाती है। परिवार में होने #पार्थ वाले हर मांगलिक कार्यक्रम की रौनक पुत्रियों से ही होती है। विवाह के बाद भी पुत्री अपने माता-पिता के करीब ही होती है। इसलिए पुत्री से कभी वाद-विवाद नहीं करना चाहिए।

12. पत्नी
हिंदू धर्म में पत्नी को अर्धांगिनी कहा जाता है, जिसका अर्थ है पति के शरीर का आधा अंग। किसी भी शुभ कार्य व पूजन आदि में पत्नी का साथ में होना अनिवार्य माना गया है, उसके बिना पूजा अधूरी ही मानी जाती है। पत्नी ही हर सुख-दुख में पति का साथ निभाती है।#पार्थ  वृद्धावस्था में यदि पुत्र आदि रिश्तेदार साथ न हो तो भी पत्नी कदम-कदम पर साथ चलती है। इसलिए मनु स्मृति के अनुसार पत्नी से भी वाद-विवाद नहीं करना चाहिए।

13. पुत्रवधू
पुत्र की पत्नी को पुत्रवधू कहते हैं। भारतीय संस्कृति के अनुसार पुत्रवधू को भी पुत्री के समान ही समझना चाहिए। पुत्रियों के अभाव में पुत्रवधू से ही घर में रौनक रहती है। कुल की मान-मर्यादा भी पुत्रवधू के ही हाथों में होती है। परिवार के सदस्यों व अतिथियों की सेवा #पार्थ भी पुत्रवधू ही करती है। पुत्रवधू से ही वंश आगे बढ़ता है। इसलिए यदि पुत्रवधू से कभी कोई चूक भी हो जाए तो भी उसके साथ वाद-विवाद नहीं करना चाहिए।

14. गृह सेवक यानी नौकर
मनु स्मृति के अनुसार गृह सेवक यानी नौकर से भी वाद-विवाद नहीं करना चाहिए क्योंकि पुराने सेवक आपकी व आपके परिवार की कई गुप्त बातें जानता है। वाद-विवाद करने पर वह गुप्त बातें सार्वजनिक कर सकता है। जिससे #पार्थ आपके परिवार की प्रतिष्ठा खराब हो सकती है। इसलिए नौकर से भी कभी वाद-विवाद नहीं करना चाहिए।

15. दामाद
पुत्री के पति को दामाद यानी जमाई कहते हैं। धर्म ग्रंथों में दामाद को भी पुत्र के समान माना गया है। पुत्र के न होने पर दामाद ही उससे संबंधित सभी जिम्मेदारी निभाता है तथा ससुर के उत्तर कार्य (पिंडदान, तर्पण, श्राद्ध आदि) करने का अधिकारी भी होता है। दामाद #पार्थ से इसलिए भी विवाद नहीं करना चाहिए क्योंकि इसका असर आपकी पुत्री के दांपत्य जीवन पर भी पढ़ सकता है ।